Friday, January 8, 2016

क्या सरस्वती ज्ञान की देवी है ?

क्या सरस्वती ज्ञान की देवी है ? 
अगर है तो इन शंकाओ का समाधान करे
1. इसके बिना इसाई, मुसलमान, प्रकृतिपूजक आदि कैसे ज्ञान प्राप्त कर पा रहे है?
2. सरस्वती कितनी भाषाएँ जानती हैँ ?
3. हड़प्पा सभ्यता की लिपि अब तक नहीं पढ़ी गई। इस संबंध में सरस्वती का क्या प्लान है ?
4. सरस्वती के होते हुए स्कूलो में शिक्षको की जरूरत क्यों पड़ती है ?
5. अंग्रेजो के पहले भारत में अंग्रेजी क्यों नहीं थी? क्या सरस्वती पहले अंग्रेजी नहीँ जानती थी ?
6. कई देश शतप्रतिशत साक्षर हो गए, जबकि भारत सरस्वती के होते हुए भी साक्षरता में पीछे है, आखिर क्यों?
7. मनु ने मनुस्मृति में शुद्रो का पढ़ना दंडनीय माना है। सरस्वती ने कभी इस मामले में कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया? क्या सरस्वती भी इस षडयंत्र में शामिल थी? ज्ञान अगर सरस्वती देती है, क्या यह ज्ञान मनु को सरस्वती ने ही दिया था कि वर्ण जाति के आधार पर लोगो का शोषण किया जाए?
8. कई भाषाएँ लुप्त हो गई और कई लुप्त हो रही है।सरस्वती उन्हे क्यों नहीं बचा पा रही है? क्या इतनी सारी भाषाओँ को याद रखना उसके लिए मुश्किल है?
9. कुछ बच्चे मेहनत करने पर भी पढ़ाई में कमजोर होते है, क्या वह भेद भाव सरस्वती ही पैदा करती है?
10. सरस्वती के होते हुए मटरगस्ती करने वाले,भ्रष्ट लोग शिक्षक कैसे बन जाते है?
11. वसंत पंचमी पर ब्राह्मणही सरस्वती की पूजा संपन्न करवाते है तथा सरस्वती की मूर्ति स्थापना भी पंडित ही करते है, सरस्वती दूसरी जातियोँ से पूजा क्यों नहीं करवाती है, क्या सरस्वती जातिगत धर्मगत भेदभाव का समर्थन करती है या सरस्वती ब्राह्मण जाति की है?
12. सरस्वती ने अपने ही बाप की रखैल बनना स्वीकार किया, क्यों उसका ज्ञान और उसकी शिक्षा स्वयं उसे ही खुदके बलात्कार से नहीं बचा पाई?
13. सरस्वती महिला है फिर भी महिलाओ की साक्षरता दर जबरदस्त कम है ,क्यों ?
14. सरस्वती के होते हुए आम बच्चों के लिए खस्ता हाल स्कूल और अमीरजादों के लिए डीपीएस जैसे कोंवेन्ट स्कूल क्यों हैं? इस मामले में सरस्वती ने आज तक कोई निर्णय क्यों नहीं लिया?

नाम राम प्रवेश दास: जाति चमार

इसे गौर से पढ़िए प्लीज...
इस युवक का नाम राम प्रवेश दास है। जाति चमार। घर गया (बिहार) के बैजनाथपुर गांव में है। ये बंदा मगध यूनिवर्सिटी में कॉमर्स सब्जेक्ट से जेनरल कोटे के बराबर अंक लाकर प्रि-पीएचडी पास किया। उसके बाद इंटरव्यू फेस किया। इंटरव्यू में पास करने के बाद पीएचडी कोर्स वर्क में एडमिशन करवाया, जिसमे सामान्य वर्ग के छात्रों के बराबर (12,500 रूपये) फीस जमा किया। 6 महीने के कोर्स वर्क कंप्लीट करने के बाद इसका एग्जाम दिया। जिसमें अनिवार्य न्यूनतम (50%) अंक से ज्यादा अंक प्राप्त किया। इसके बाद आयी सिनोप्सिस जमा करने की बारी। यूनिवर्सिटी के कॉमर्स डिपार्टमेंट के अनुसार इसके लिए गाइड का होना जरूरी है। पर इसके दलित होने के कारण यूनिवर्सिटी का कोई प्रोफ़ेसर इसका गाइड बनने को तैयार नहीं है। ये हालत तब है, जब बिहार के सभी यूनिवर्सिटी के हेड (कुलाधिपति) महामहिम राज्यपाल कोविन्द साहब और बिहार के शिक्षामंत्री अशोक चौधरी जी दलित हैं। राम प्रवेश दास बहुत गरीब परिवार से है। प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता है। ये यूजीसी के नियमावली 2009 के अनुसार पीएचडी कर रहा है। इसलिए पीएचडी होने के बाद लेक्चरर बनने के लिए नेट पास करने की बाध्यता नहीं रहेगी। क्योंकि बिहार के दलित न के बराबर कॉमर्स पढ़ते हैं। और भी पढ़ते हैं, तो बीकॉम से आगे नहीं पढ़ते। इसलिए लेक्चरर की वैकेंसी आने पर, रिक्त पद जितने भी SC उम्मीदवार नहीं मिलते। ऐसे में अगर राम प्रवेश दास पीएचडी कर लेता है तो इसके लेक्चरर बनने का रास्ता साफ़ हो जायेगा। मैं चाहता हूं कि आप सब इन्हें सहयोग करें। ज्यादा कुछ नहीं बस इस पोस्ट को शेयर करें। ताकि मगध यूनिवर्सिटी की पोल खुले और बात राज्यपाल महोदय एवं शिक्षामंत्री जी तक पहुंचे। धन्यवाद।

Dalit student thrashed until he vomits for touching upper caste plates

Dalit student thrashed until he vomits for touching upper caste plates

January 3, 2016India,News,Top StoriesLeave a commentJodhpur: 

In a shocking incident, a lower caste Dalit student of a government school was beaten up by his teacher till he started vomiting for touching plates being reserved for the upper caste.According to media reports, the episode happened on October 1, a day before Gandhi Jayanti in Government Higher Secondary School in Osian town of Jodhpur, when a seven-year-old picked up a green coloured plate (reserved for the upper caste) where mid-day meal was being served."I picked up a plate reserved for upper caste students mistakenly and started having the rice on it. When the teacher saw this, he started hitting me badly on my head. I started vomiting," Ramesh, a Dalit, told TOI.According to Dalit Adhikar Network, "the plates there are coloured red and green for Dalits and upper castes, respectively. The seven-year-old had to be rushed to Umaid Hospital in Jodhpur. His treatment went on for six days."Malaram, father of the Dalit student, was also allegedly beaten up when he came to pick up his son from school."The cook in the school noticed Ramesh picking up a plate reserved for upper caste students. He complained about this to the teacher, who bashed up Ramesh. He kicked Ramesh and pulled his hair. He thrashed him severely, and this led to some internal injuries in his ears, because of which he still fears going to the school. When I visited the school, the teacher thrashed me too," said his father Mala Ram.On Thursday a public hearing was held by Dalit Adhikar Network at Pant Krishi Bhavan in collaboration with Action Aid and Jai Bhim Vikas Sikshan Sansthan and it came to fore that separate plates were kept for Dalit students and those belonging to a higher caste.A complaint has been filed against the teacher but police is yet to take any action against him. The district officer, elementary education, suspended the teacher and transferred him to Jodhpur. But the teacher is still present at that same school."

जातिगत जनगणना के फायदे

अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग महासंघ
जातिगत जनगणना के फायदे .........
१)अगर जातिगत जनगणना हो जाती है तो यह पता चल जाएगा की किस जात की कितनी संख्या है ,और उसको उस अनुपात में आरक्षण द्वारा सरकारी नौकरी दे दी जायेगी ,ताकि सभी जातियों की बेरोजगारी दूर कीजा सके !!
२)जातिगत जनगणना से यह जानकारी मिल जायेगी की कौन सी जात कितनी पढ़ी लिखी है और कौन से जात मेंकितने अनपढ़ है ताकि उन जातियों को विशेष रूप से एजुकेशन लेने के लिए प्रेरित किया जाय और उनकी अशिक्षा दूर की जा सके !!
३)जातिगत जनगणना से OBC की सही आबादी मालुम हो जायेगी ताकि बार बार हाई कोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में बैठे ब्राह्मण यह न बोल सके की हमें ओबीसी की सही आबादी नहीं मालुम है इसलिए उनको रिजर्वेशन कितना दिया जाय यह हम नहीं कह सकत
4)जातिगत जनगणना से तह भी पता चल जाएगा की किस जातियों में कितने IAS IPS IRS IFS कितने टीचर कितने लेक्चरर कितने vice चांसलर है और कितने झाड़ू खाते में है कितने टेम्परेरी है कितने परमानेंट जॉब वाले है ताकि सारी असलियत सामने आ जाए की कौन सी जात का कब्ज्जा कहा है और कौन सी जात कहा कहासे गायब है !!
५)जातिगत जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा 52% से जयादा आबादी वाले ओबीसी को होगा क्योकि संख्या मालूम होने पर ही वो उसी अनुपात में भारत के बजट में अपनी भागीदारी माग पायेगा ,मतलब अगर 20 लाख करोड़ का बजट है तो उसके हिस्से में 11लाख करोड़ रुपये आयेंगे
६)जातिगत जनगणना से यह भी पता चल जाएगा की कौन सी जातियों में महिलाए ज्यादा है और कौन सी जातियों में महिलाए कम है ,किस जात में बूढ़े ज्यादा है किस जात में बच्चे ज्यादा है ताकि उस हिसाब से कन्या भ्रूण ह्त्या ,बच्चो का कुपोषण रोका जा सक
े7) जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास पक्का मकान है और किस जात के लोग फुटपाथ पर सोकर जीवन बिता रहे है ताकि गरीब और पिछड़ी जातियों को पक्के मकानों का बंदोबस्त कियाजा सके !
८) जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास कितनी खेती है कितनी प्रोपर्टी हैऔर कौन सी जात भुखमरी से मर रही है ताकि उन जातियों की दशा सुधारने के लिए अलग से बजट का प्रावधान किया जा सके !
९)जातिगत जनगणना से सभी जातियों को आर्थिक सामाजिक भौगोलिक स्तिथि का सही आकलन हो पायेगा
१०) जातिगत जनगणना भारत में समानता स्थापित कर सभी लोगो को उनकी सभी प्राकृतिक और भौगोलिक संपदाओ में बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करेगा
UNITY OF OBC - जागो ओबीसी जागो

 —  with Ssprasad Yadav, ओबीसी महासंघ उत्तर प्रदेश, Køli Bakul Makwana, Dinesh Bhartiye Spyfi, Abu Laeeq Siddiqui,Abhishek Yadav, A Anju Yadav, Abdul Naseer Nasir, Aap Qureshi, Abdullah Neta Ji, Abhai Kumar Verma, Aarohi Patel, Abdul Mujeeb Khan, Aarti Maurya,Aatif Khan, Abhay Mourya, Abigaely Silayo, Abhilash Rajput, Abhi Kumar,Aarti Kushwah, Abhass Bharat,Abhimanyu Simhmar, Abhay Kumar,Abhishek Kushwaha, ओबीसी महासंघ (remove), Abhiraj Mane, Abhishek Verma, Abhishek Shakya, Abhijit Pal,Abhishek Kashyap, Abhishek Singh,Abhishek Maurya, Abhi Kashyap, Abhay Pratap Singh Shakya, Abhishek Yadav,Aamir Jamal Siddiqui, Abhishek Kumar,Abhinav Kashyap, Abnish Kushwaha,Abhi Yadav, Abhaykumar Kushwaha,Abinash Bharti, Abhishek Maurya,Abhimanyu Maurya, Abhishek Arya,Abhishek Singh, Abhinandan Sahni andAbhijeet Maurya

Wednesday, January 6, 2016

हमें शासक बनाने के लिए डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि..

ब्राह्मण 3.5% अल्पसंख्यांक है, फिर भी भारत में ब्राह्मण समाज शक्तिशाली समझा जाता है- वे शासक वर्ग है, उनपर कोई अत्याचार नहीं होता है, क्योंकि, ब्राह्मण लोग प्राचीन काल से संगठित है- पहले वे "ब्राह्मण सभा" के माध्यम से संगठित थे; अभी वे RSS के माध्यम से संगठित है। संगठन ही शक्ति होती है। संगठन की मदद से कुत्ता भी शेर बनता है, लेकिन, संगठन के बिना शेर भी कुत्ता बन सकता है! 

प्राचीन काल में ब्राह्मण लोगों की ब्राम्हण सभा हर गांव, हर नगर में कार्यरत रहती थी; अभी उनका RSS संगठन हर गली, हर गांव, हर शहर में कार्यरत हैं। इस सामाजिक संगठन की मदद से ब्राम्हण लोग देश की व्यवस्था अपने कब्जे में रखते हैं। राजा कोई भी हो, लेकिन, उसके राज्य पर, अर्थात, व्यवस्था पर ब्राह्मणों का कब्जा रहता है! इसलिए, भारत में कई राजा हुए, मुगल बादशाह हुए, लेकिन, व्यवस्था ब्राह्मणों की ही रही। वर्तमान में भी कहने को लोकशाही है, लेकिन व्यवस्था पूर्णतः RSS के कब्जे में हैं।

हमारा मुलनिवासी समाज बहुसंख्यांक है, इसलिए बहुजन कहलाता है, लेकिन हमारा कोई भी देशव्यापी सामाजिक संगठन नहीं है। हमारे हजारों छोटेमोटे राजकीय या धार्मिक संगठन है, लेकिन देशव्यापी सामाजिक संगठन एक भी नहीं है। इसलिए, हम समस्याओं से घिरे हैं; क्योंकि हम गुलाम है और समस्या गुलामों की ही होती है। ब्राह्मण स्वतंत्र है, इसलिए देश में उनकी कोई समस्या नहीं है।

अर्थात, संगठन के अभाव की वजह से हम समस्याग्रस्त और गुलाम है। क्योंकि, संगठन के अभाव में समाज भीड में तब्दील हो जाता है। हमारे लोग करोडों की संख्या में है- भारत में SC 15 करोड है, ST 8 करोड है, मुस्लिम 18 करोड है,  OBC लगभग 60 करोड है; लेकिन यह सारे लोग सामाजिक लेवल पर विभाजित है, इसलिए भीड में तब्दील हुए हैं। 

भीड का एक ही वसूल होता है कि, उसका सिर्फ इस्तेमाल होता है और उसे जैसा चाहे वैसा हाँका जाता है। इसलिए, भीड केवल गुलाम बन सकती है, शासक नहीं!!

अर्थात, हम भीड में तब्दील हुए हैं, इसलिए गुलाम है। हमें शासक बनाने के लिए डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि, पहले शिक्षित बनो, संगठित बनो और फिर शासक बनो। हमारे लोग देशव्यापी संगठन बनाते नहीं, लेकिन, शासक बनने के सपने मात्र हरदिन देखते हैं! हमारे बहुजन समाज को विदेशी ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए बामसेफ ने "भारत मुक्ति मोर्चा" इस देशव्यापी सामाजिक संगठन (National social organisation) का निर्माण किया है। सभी मुलनिवासी बहुजनो से अनुरोध है कि, इस संगठन में खुलकर काम करें।

जय मुलनिवासी।

फेसबुक एवं मनु

Facebook and manu फेसबुक
एवं मनु
अगर मनु महाराज ने फेसबुक का निर्माण किया होता तो उसके नियम कुछ इस तरह होते1. ब्राह्मण फेसबुक को हमेशा प्रयोग कर सकता है ।2. क्षत्रिय फेसबुक को दिन में सौलह घंटे प्रयोग कर सकता है ।3. वैश्य फेसबुक को दस घंटे प्रयोग कर सकता है ।4. शूद्र फेसबुक को रात के बारह बजे से दो बजे तक प्रयोग कर सकता है बशर्ते उससमय उपरोक्त तीनो वर्ण का कोई सदस्य ऑनलाइन नहीं हो ।5. अछूत फेसबुक को सिर्फ दो बजे से तीन बजे तक प्रयोग कर सकते हैं बशर्ते उपरोक्त चारों वर्ण के व्यक्ति मौजूदना हो ।6 . ब्राह्मण सिर्फ पोस्ट लिखेंगे कभी लाइक या कमेंट नहीं करेंगे । ब्राह्मण कमेंट तभी करेंगे जब कोई उनकी पोंगा पंथी पर चोट करेगा ।7. क्षत्रिय सिर्फ ब्राह्मणों के पोस्ट लाइक करेगा और पोंगापंथी के खिलाफ लिखने वालो को जमकर धमकी देगा । क्षत्रिय अपनी पोस्ट भी लिख सकता है । क्षत्रिय का मुख्य कार्य ब्राह्मणों के द्वारा लिखी पोस्टों की रक्षा करना है ।8. वैश्य सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय की लिखी पोस्टों को शयेर करेगा ।9. शूद्र इन तीनों की लिखी पोस्टों से दूर रहेगा अगर उसने गलती से भी इन पोस्टों को लाइक कर दिया तो उसको तत्काल प्रभाव से ब्लाक कर दिया जायेगा । कमेंट करने पर उसका मोबाइल जब्त कर लिया जायेगा ।10. अछूत सिर्फ अपनी पोस्टों पर ही लाइक और कमेंट करेंगे अगर उन्होंने चारो वर्णों के सदस्यों की पोस्ट पर लाइक या कमेंट करने की कोशिश की तो उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराकर पोस्टकी शुद्धि हेतु पोस्ट को हटाकर दोबारा लिखा जायेगा और पोस्ट को दोबारा लिखने से पहले मोबाइल और कंप्यूटर को गौ मूत्र से नहलाकर पवित्र किया जायेगा ।11. फेसबुक का उपयोग स्त्रियों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है । स्त्रियों को फेसबुक पर आने से रोकने के लिए विशेष इंतजाम किये गए हैं ।

आरक्षण को लेकर भ्रम और तथ्य

आरक्षण को लेकर भ्रम और तथ्य

January 4, 2016, 12:38 PM IST 

रिजर्वेशन यानी आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जो समय-समय पर देश में चर्चा का मुख्य विषय बन जाता है। देश की ज्यादातर जनता, खासकर नई जनरेशन का अधिकतर हिस्सा भी आरक्षण के बारे में उन्हीं बातों को जानता है जिसे वह मीडिया के माध्यम से सुनता-पढ़ता है।

पिछले दिनों एक मैगजीन में आरक्षण विषय पर पूर्व आईएएस अधिकारी पी.एस. कृष्णन का लेख पढ़ा। 'आरक्षण के तथ्य और मीडिया में गलत बयानबाजी' नाम के इस लेख के अनुसार आरक्षण को लेकर जनता में कई तरह की गलतफहमियां हैं, और कई मीडियाकर्मी भी इस बारे में अल्पज्ञान रखते हैं। इस लेख के कुछ अहम अंश आप सभी से साझा करना चाहता हूं।

भ्रमः इस देश में आरक्षण की शुरुआत वोट के भूखे राजनेताओं ने शुरू की थी।

तथ्यः पहली बार आरक्षण की शुरुआत 1902 में कोल्हापुर के राजा छत्रपति साहू जी महाराज ने की थी। फिर 1921 में मैसूर के महाराजा ने आरक्षण लागू किया था। 1921 में ही मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल का उत्तरी हिस्सा और कर्नाटक का कुछ हिस्सा आता है।) में जस्टिस पार्टी ने आरक्षण की शुरुआत की थी। यहां गौरतलब है कि ब्राह्मण एकाधिकार को चुनौती देते हुए और उसका दमन करने के वादे के आधार पर ही जस्टिस पार्टी सत्ता में आई थी। इस तरह आरक्षण की शुरुआत राजाओं और भारतीय राजनीतिज्ञों द्वारा की गई थी।

भ्रमः 1950 में भारत के संविधान के बाद आरक्षण की शुरुआत हुई थी।

तथ्यः राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की पहल पर 1943 में ही लागू किया गया था। उन्होंने यह समझ लिया था कि अंग्रेजों के बाद जिनके हाथों में भारत की बागडोर होगी, वे अनुसूचित जातियों को आरक्षण व अन्य सहूलियत देने में हिचकिचाएंगे। यही कारण था कि वह वायसरॉय के कार्यकारी परिषद में बतौर सदस्य शामिल हुए थे।

भ्रमः संविधान द्वारा सिर्फ दस वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

तथ्यः आरक्षण की तीन श्रेणियां हैः

राज्यों के पदों और सेवाओं में आरक्षण (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों, यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थाओं सहित सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 12 की व्याख्यानुसार स्टेट का दर्जा प्राप्त संस्थाएं।)शिक्षण संस्थानों की सीटों में आरक्षण।लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में सीटों का आरक्षण। आमतौर पर जिसे राजनीतिक आरक्षण के रूप में संबोधित किया जाता है।

इनमें से केवल तीसरी श्रेणी के आरक्षण के लिए शुरू में 10 वर्षों का प्रावधान था। जबकि एक और दो श्रेणी के आरक्षण के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी। बहुत सारे विद्वान और ऐंकर तीसरी श्रेणी की 10 साल की समयसीमा को पहले और दूसरे श्रेणी के लिए भी बताते हैं जबकि उनके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी।

भ्रमः आरक्षण का उद्देश्य गरीबी खत्म करना या कम करना है।

तथ्यः संविधान के अनुसार आरक्षण का उद्देश्य गरीबी कम करना या खत्म करना कभी नहीं रहा। बेरोजगारी के समाधान हेतु आरक्षण को एक युक्ति के तौर पर कभी नहीं लिया गया। आरक्षण का उद्देश्य शासन और प्रशासन के ढांचे में असंतुलन को ठीक करना था। इसका उद्देश्य शिक्षा और चुनावी सीटों की उस संरचना को मजबूती प्रदान करना था जो भारतीय जाति व्यवस्था द्वारा निर्मित असंतुलन और असमानता के कारण बना था।

साफ शब्दों में कहा जाए तो शासन व प्रशासन में से उच्च जातियों के एकाधिकार को खत्म करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियों/जनजातियों को समान अवसर उपलब्ध करवाने के लिए ही इस आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

हालांकि इस संबंध में कई लोगों का कहना है कि आरक्षण को आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू करना चाहिए, लेकिन संविधान में नहीं निर्देशित होने के कारण आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं होती है।

यह कॉन्टेंट अंग्रेजी की मास मीडिया मैगजीन के अंक 45 से लिया गया है और यहां उसका संक्षिप्त हिंदी अनुवाद पेश किया जा रहा है। मूल लेखक पी. एस. कृष्णन समाज कल्याण मंत्रालय में पूर्व सचिव रहे हैं और आरक्षण को लेकर इन्होंने बहुत काम किया है। वर्तमान में यह तेलंगाना सरकार में कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त सलाहकार हैं।

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